धारणा

हम इंसान, एक सामाजिक जीव हैं।

हमें समाज में रहना पसंद है, एवं हम सभ्यता से , नियमबद्ध तरीक़े से जीना पसंद करते हैं।

जब से इतिहास बनना शुरू हुआ, इंसान ने हमेशा किसी न किसी का अनुसरण किया।

स्वर्णयुगों में भगवानों का, कभी राजाओं का, कभी महापुरुषों का, तो कभी सादा जीवन जीने वाले साधुओं का।

इंसान की अनुसरण करने की आदत कभी विलुप्त नही हुई,  बल्कि इसने एक रूप लिया, जिसको हमने धर्म कहा।

धर्म , संसार के समस्त मनुष्यों में प्रांतो के अनुसार फैलने लगा।

धर्म के नियम निर्धारित हुए, उसकी मर्यादाएं निर्धारित हुईं।

सब सही चल रहा था कि तभी कुछ लोगों ने खुद को धर्म का रक्षक मानना शुरू कर दिया। उन्हें लगने लगा कि धर्म एक तरह का आडम्बर है, जिसके न होने पर कोई आपकी इज़्ज़त नहीं करेगा, कोई आपकी बात नहीं सुनेगा एवं आप  समाज से बहिष्कृत कर दिए जायेंगे।

इस डर ने जन्म दिया धार्मिक तुलनात्मक विचार को, जिसके तहत लोग अपने धर्म को दूसरे के धर्म से बड़ा बताने लगे।

जैसे जैसे समय बीतता गया, इस तुलना ने आक्रामक रूप ले लिया एवं धर्म के साथ कट्टरता ने जन्म ले लिया, जो कि आजतक समाज मे व्याप्त है।
धार्मिक कट्टरता ही इकलौता कारण है जिसके कारण लोग धर्म को लेकर सवाल पूछने में डरते हैं। लोग धर्म के पुराने एवं बेकार हो चुके नियमों के बारे में आलोचना नहीं कर सकते, हानिकारक प्रथाओं के प्रति आवाज़ नहीं उठा सकते। 

क्यों?

क्योंकि धर्म के मामले में हाथ डालने में सबको डर लगता है।

ना तो सरकारें, ना ही आमजन, चाहे शिक्षित या अशिक्षित, कुछ बोलने की हिम्मत रखते हैं।

डर लगता है, कि कहीं हमने कुछ ऐसा पूछ लिया जिससे सामने वाला अपमानित महसूस करे, और कहीं वो आक्रामक हो गया तो क्या होगा।

मेरे परिवार, संपत्ति, ज़ायदाद आदि का क्या होगा।
डर के साये में जीते जीते इतनी सदियां निकल चुकी हैं कि धार्मिक कट्टरता अब एक सामाजिक रूप से माननीय तथ्य बन गया है। कोई कुछ बोलने की हिम्मत नहीं रखता, और कोई पूछे क्यों, तो उसके आगे उदाहरण पेश कर दिए जाते हैं। कि कैसे कोई धर्म के विरुद्ध गया, और उसको सज़ा के मौत दे दी गई।
ज़रा सोचिए।

जब आपके पूर्वज भी पैदा नहीं हुए थे तबके नियमों, प्रथाओं के लिए आप अपनी जान देने को भी तैयार हैं?
दूसरे के धर्म को कुधर्म बताते हैं क्योंकि आपकी और उनकी विचारधारा अलग है?
क्या इंसान, धरती के सबसे ज़्यादा बुद्धिमान जीव, का दिमाग इतना संकीर्ण हो गया है कि सिर्फ़ कुछ नियम-कायदों के अंतर्गत ही सोच सकेगा, और यदि उसके बाहर सोचा तो धार्मिक कट्टरता के चलते खत्म कर दिया जाएगा?
मैं कोई उदाहरण पेश नहीं करूँगा क्योंकि इतिहास में पर्याप्त संख्या में उदाहरण उपलब्ध हैं।
इंसान को स्वयं का अवलोकन करना पड़ेगा कि वो क्यों आखिर खुद को, खुद की सोचने की अकूत शक्तियो को धार्मिक बन्धनों में जकड़े हुए है। क्यों आखिर उन्ही पुराने नियमों के अनुसार स्वयं का जीवन जी रहा है। क्यों उन बेबुनियाद प्रथाओं को सर्वोपरि समझ कर अपना अनमोल समय बरबाद कर रहा है।
अतः निवेदन है,

कृपया धार्मिक तथ्यों का शोधन करें। अपनी समझ से नियमों एवं प्रथाओं को आज के समाज के अनुसार आँक कर देखें कि क्या वो आज भी सही हैं।

और अपना मष्तिष्क खुले विचारों वाला रखें।
धर्म का आविष्कार इसलिए हुआ था ताकि इंसान मर्यादा में रहे, एवं जीवन को सही तरीके से जी सके।

सर्वधर्मों का सम्मान करें, क्योंकि ईश्वर तो आखिर एक ही है।

याद रखें-

“उदारचरितानां तू वसुधैव कुटुंबकम।”
– 

अभिनव जैन

One Reply to “धारणा”

  1. Sahi soch hai,bahut he bdea,Abhinav
    Aur mera ye wishwas bhi hai ke ,aage aane vale peedi, aur hum Apne Vicharo Ko khula rakhinge aur Dharm se bandh kr nahi Dharm ko Sarah rakh kr sochinge………
    Bahut bdea

    Liked by 1 person

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s